ये भी जानो


सम्माननीय लेक्चर्रस,
में लम्बे समय से आपसे रूबरू नहीं हो पाया सॉरी. कुछ दिनों से में मेरी इच्छा थी की में अपनी बात आपके सामने रक्खु. में अपनी (रेसला) की दूसरी मांग (प्रमोशन) में आर. इ. एस. आर. १९७० में स्थापित नियम २८(७) की शब्द-दर-शब्द पालना का पक्षपाती हूँ. क्योंकि स्थापित नियम की पालना में यदि अधिकारी द्वारा अवहेलना की गयी हे तो उसका समाधान आसानी से हो सकता हे. दूसरा जब नियमानुसार संयुक्त वरिष्ठता सूचि बनेगी तो आप (लेक्चर्रस) ही उस सूचि में पहले और अंतिम होंगे (क्योंकि आप आप आवश्यकता के पांच गुने से भी ज्यादा संख्या में वरिष्ठ हें). तीसरा आर. इ. एस. आर. १९७० मे किसी प्रकार के संशोधन की आवश्यकता भी नहीं रहेगी. इसके पक्ष में सर्वोच्य न्यायालय का फेसला भी है.
लेकिन, यदि आपने अनुपात की बात मानी तो आप १९८८ के इतिहास को पुनः दोहराएंगे. उस २०.१०.१९८८ के समझोते को एक बार पुनः देखे और जाने क
ी क्या उस समझोते में कहीं भी लिखा था, की ०१.०९.१९८८ से पूर्व के सभी हेडमास्टर की पदोन्नति वाईस-प्रिंसिपल के पद पर होने बाद ही हेडमास्टर और लेक्चरार की पदोन्नति वाईस-प्रिंसिपल के पद पर ५०:५० % का नियम लागु होगा. दूसरा जब ०१.०९.१९८८ से पूर्व के सभी हेडमास्टर की पदोन्नति वाईस-प्रिंसिपल के पद पर हो गयी तो आपके साथ ५०:५० % की पदोन्नति में वे हेडमास्टर ५०% के भागीदार बने जो ०१.०९.१९८८ के बाद जन्मे अर्थात ०१.०९.१९८८ के बाद नियुक्त या पदोन्नत हुए. यानि हेडमास्टर ०१.०९.१९८८ के बाद का और आप १९७७ या १९७८ या १९८० या १९८१-८२ के कितना बड़ा प्राकृतिक न्याय था. अर्थात आपने १९८८ में पद नहीं लगभग ८-१२ वर्षों की गुलामी स्वीकार की. और यदि आप अनुपात के विरोध को अन्यथा लेते हे तो मेरी बधाई स्वीकार करे. जय रेसला.
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Resla Raj

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